30 जनवरी १९४८, उस दिन अपराधी कौन था?

30 जनवरी १९४८, उस दिन अपराधी कौन था?

अपराध वाली घटना पर उस दिन तीन तरह के लोग थे | एक जो अपराध का शिकार हुए, महात्मा गाँधी, एक जिसने अपराध किया नाथूराम गोडसे, और बाकि वहां पर उपस्थित सभी जन गवाह | लेकिन, अपराधी कौन था,  यह आज भी हर भारतीय के मन में है लेकिन कोई कहना नहीं चाहता |

उस वक़्त के सारे गवाह मूक रहे. न लेखक, न विचारक, न कोई चित्रकार, न कोई कवि, न कोई फिल्म मेकर और नहीं हीं कोई अनुसंधानकर्ता, आखिर क्यूँ? किसने बंदिश लगा रखी है गाँधी के इस देश में जहां गाँधी सत्य और अहिंसा के लिए लड़ते रहे. जहां लोकतंत्र है, बेबाक और बिंदास बोलने की आजादी है, भले ही उस वाणी में कटुता भरी हो या देश को टूकडे टूकडे करने की बात कही गयी हो | 

संविधान अथवा IPC के की किस धारा के तहत, इस देश की जनता १९४८ में हुए गाँधी जी की हत्या के कारणों को जानते हुए भी अपराधी का नाम नहीं ले सकती और इस अपराधी नाथूराम का पक्ष लेनेवाला भी अपराधी बन जाता है और उसे सार्वजनिक रूप से माफ़ी मांगनी पड़ती है और फिर, सिर्फ उसे ही अपराधी मानती है जिसने सिर्फ होने वाले बड़े अपराध को एक हत्या के अपराध से रोक लिया था | 

क्या नाथूराम गोडसे ने पहले किसी की हत्या की थी? क्या नाथूराम ने किसी को अपराधी बनाया था ? और प्रश्न यह भी उठता है कि नाथूराम को अपराधी किसने बनाया, किसके नीतियों की वजह से नाथूराम सदैव के लिए अपराधी बन गया, कलंकित हो गया? यदि नाथूराम को किसी व्यक्ति ने नहीं बनाया तो यह कहना भी दुर्भाग्य ही होगा क्यूंकि सत्य को दबाया जा रहा है लेकिन हत्या करने के लिए उस परिस्थिति को जन्म देनेवाला कौन था जिसमे एक देशभक्त विचारक को कलम के बाद हथियार उठाने पर विवश होन पडा?  

क्या गाँधी जी ने नाथूराम को अपमानित किया था कभी? अ नाथूराम ने गांधीजी की बकरियां चोरी कर ली थी और उस वजह से नाथूराम के खिलाफ गाँधी जी ने FIR करवाया होगा और फिर खुद को कानूनी करवाई से बचने के लिए उन्होंने उनकी हत्या कर दी | अफ़सोस ऐसा कुछ भी नहीं था | नाथूराम ने इन वजहों से हत्या नहीं की थी और शायद  होती भी तो हत्या नहीं करते | 

क्या नाथूराम की प्रवृति हत्यारों वाली थी या फिर कमल हसन के ब्यान के हिसाब से आतंकवादियों सी थी? क्या नाथूराम जिहाद के नाम पर मजलूमों की हत्या कर अल्लाह हो अकबर का नारा लगा रहा था? क्या नाथूराम आतंकवादियों की तरह मजलूमों का नाजायज फायदा उठा रहा था ? या फिर इन मजलूमों को धर्म के नाम पर कट्टरतावादी का ज्ञान देकर उन्हें मानसिक रूप से विकृत कर रहा था ? आतंकवादी तो ये सब करते है फिर कमल हसन ने कैसे यह कह दिया कि हिन्दू आतंकवादी नाथूराम गोडसे था? फिर उन मुस्लिम आक्रान्ताओं के बारे में क्या कहेंगे कमल हसन जिन्होंने ने लाखों हिन्दू को मारा, स्त्रियों के साथ बलात्कार किया, मंदिरें तोड़ीं, जन-आवाम की तिजोरियां भी लूट लीं?  क्या उस वक़्त के मुस्लिम तबको के बीच आतंक का बीज बटवारा के नाम पर नाथूराम ने बो दिया था ? 

गाँधी जी की कोमल ह्रदय ने, नेहरु की सत्ता-स्वार्थ ने और जिन्ना की हिन्दुओं के प्रति नफ़रत ने इतिहास में उस कुकृत्य को दर्ज करवाया है जिसमे लाखों लोगो की जान गई, लाखो लोगों को विस्थापित होना पड़ा | विश्व के इतिहास में सबसे बड़ा विस्थापन का गर्व किसको होगा जब इस विस्थापन प्रक्रिया में लोग अपने बेटियों, बहुयों और बहनों के साथ होते कुकृत्यों को रोक नहीं पाते थे? मार दिया जाते थे ? काट दिए जाते थे? ट्रेनों में लाशें लद लद कर भारत आया करती थी?

सगे सम्बन्धियों को खो चुके थे, बच्चों तक तो नहीं छोड़ा जा रहा था | वर्षो से मेहनत से अर्जित धन धान्य सब कुछ सिर्फ एक व्यक्ति के निर्णय  और सहमति की वजह से तार तार हो गया था, छिन्न भिन्न हो गया था | क्या इस पर उस वक़्त की राजनितिक पार्टिया गर्व कर रही थीं ?  

आज अगर एक व्यक्ति की हत्या हो जाये तो इल्जाम सरकार के सर मढ़ दिया जाता है | फिर, सवाल यह है कि  १९४८ में हुए उस घटना का इल्जाम उस वक़्त के किसी राजनेता के नाम पर क्यूँ नहीं उठाया जा सकता? कौन रोकता है भारत की जनता को ऐसा करने से ? इस देश का कानून, पुलिस, सुप्रीम कोर्ट, संविधान, नेता या राजनितिक दल ? यह रिवाज किसने बनाया ? मुझे तो यह लगता है कि इस नियम से सिर्फ उस दल को फायदा पहुँचता है जिसका केवल और केवल शाषन करने का ध्येय था  और अपने दल की चावी को बचने के लिए, सत्य को छिपाने के लिए इस नियम का पालन करने पर भारत की जनता को मजबूर किया |

वह दल अपने स्वार्थी नेताओं की बातों को दबाने के लिए इस तरह की कथन का प्रचालन बना दिया जो आज एक तरह का नियम नहीं बल्कि क़ानून जैसा बन चूका है ?

क्या इस देश में रहने के लिए गाँधी को मानना जरूरी है ? यदि हाँ तो फिर बहुसंख्यकों की भगवद गीता को भी सभी को मानना क्यूँ जरूरी नहीं है ? क्या गांधी कृष्ण से बड़े हो गये थे?

खैर, मेरा सवाल अभी भी वहीं का वहीं खड़ा है कि इतिहास में दर्ज गाँधी का हत्यारा ही केवल अपराधी है? 

क्या आपको देश का बटवारा पसंद है? आज कोई नेता इस देश में एक खालिस्तान बनाने के लिए या कश्मीर को अलग करने के लिए अपनी सहमती देगा तो क्या आप इस निर्णय को सहर्ष स्वीकार कर लेंगे क्यूंकि वह एक बड़ा राजनेता है या जनता द्वारा चुना हुआ प्रतिनिघी है और वह बहुत लोकप्रिय है, और इस नेता के पीछे १३० करोड़ जनता की शक्ति है, क्या इस देश की जनता यह होने देगी? क्या आप होने देंगे ? यह इस देश के लिए एक विषम परिस्थित होगी | 

इस विषम परिस्थिति में कोई न कोई देशभक्त ऐसे नेता के खिलाफ आवाज भी उठाएगा, और अगर आवाज अनसुनी कर दी गयी तो हथियार भी उठाएगा और उसे भी वही अपराध करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा जैसे नाथूराम ने किया | उसका कुकृत्य राष्ट्रहित में होगा, परन्तु उसका कुकृत्या एक नायक वाला होगा |

लेकिन ऐसा सिर्फ काल्पनिक फिल्मों में होता है | हकीक़त में अपराधी वह है जो परिस्थितयों को पैदा करे जो जनहित में न हो, जो जन-कल्याण में न हो, जो राष्ट्रहित में न हो | तब किसी अर्जुन को गांडीव उठाना ही हो होगा, किसी को कृष्ण बनकर उपदेश देना ही होगा और अन्याय के विरुद्ध  उठी आवाज को नहीं सुना गया तो कोई भी देशभक्त राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखकर, तीर चलाएगा, तलवार चलाएगा और गोली भी खायेगा |

इस देश का लोकतंत्र का अर्थ यह नहीं समाज मूक बनाकर स्वार्थी नेताओं का नग्न नाच देश की बर्बादी तक देखता रहे | समाज का हर अल्पतत्त्व अल्प-इकाई का समाज हित, राष्ट्रहित में जागृत होकर सक्रिय और सकारात्मक सहभागिता निभाना  ही लोकतंत्र है |  

मत देकर किसी को विजयी बनाने के बाद अगर मतदाता का हाथ ५ वर्षों के लिए कट जाता है तो ये कैसा लोकतंत्र है और अगर यही लोकतंत्र है तो फिर इस लोकतंत्र में देश भी बड़ा, देश भी महान और देशहित पर भरी पड़नेवाला इंसान के गलत निर्णय को रोकने के लिए कोई न कोई देशभक्त खडग, तीर और तमंचा उठाएगा ही |

लेकिन सवाल यही उठता है कि इस अपराध को जन्म देने वाला अपराधी है ? या इसका बीज बोने वाला अपराधी है ? आखिर ३० जनवरी १९४८ की शाम को कौन अपराधी था और उस अपराधी को किसने ख़त्म क्या और क्या राष्ट्रहित में किए गए अपराध, देशभक्ति नहीं ?