बोफोर्स घोटाला - किसके माथे का कलंक कांग्रेस का या देश की छवि का ?

बोफोर्स घोटाला - किसके माथे का कलंक कांग्रेस का या देश की छवि का ?

साल 1987 में स्वीडन की रेडियो ने खुलासा करते हुए बताया था कि स्वीडन की हथियार कंपनी बोफोर्स ने भारतीय सेना को तोप की सप्लाई करने का सौदा हासिल करने के लिये 80 लाख डालर की दलाली चुकायी थी। बता दें कि उस समय राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी। बता दें कि उस समय 1.3 अरब डालर में कुल चार सौ बोफोर्स तोपों की खरीद का सौदा हुआ था।

स्वीडन सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न राजीव गांधी को और शर्मिंदगी से बचाने के लिए जनवरी 1988 तक बोफोर्स गन घोटाले की अपनी जांच को बंद कर दिया था।  संयुक्त राज्य अमेरिका की केंद्रीय खुफिया एजेंसी द्वारा किए गए एक गुप्त गोपनीय आकलन से यह पता चला है। मूल्यांकन के अनुसार, स्टॉकहोम गांधी को स्वीडिश लीक और नोबेल उद्योगों (मुख्य कंपनी) द्वारा रिश्वत देने के मामले में राजनीतक और कानूनी करवाई द्वारा और उत्पन्न होने वाली परेशानियों से बचने के लिए ऐसा किया गया था। 

इसलिए  दोनों पक्षों ने भुगतानों का विवरण गुप्त रखने की योजना पर परस्पर सहयोग किया। स्टॉकहोम ने अंततः पूरी रिश्वत काण्ड जांच को बंद कर दिया, यह बात वृस्तृत रूप से सीआईए के  एक गुप्त आकलन "बोफोर्स आर्म्स स्कैंडल रीड" में बताई गयी है। अप्रैल 1988 में यह विस्तृत आकलन आयोजित किया गया था, जब भारत ने हॉवित्ज़र के लिए 1.5 बिलियन अमरीकी डालर के समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। 

सीआईए के पश्चिम यूरोपीय विभाग ने इनपुट साझा किए कि स्वीडन और भारत ने एक साथ काम किया और बोफोर्स ने लगभग निश्चित रूप से होवित्जर सौदे को सुरक्षित करने के लिए रिश्वत का भुगतान किया। 

हाल ही में डिकैफ़िनेटेड CIA रिकॉर्ड्स से पता चलता है कि वाशिंगटन भारत और स्वीडन में बोफोर्स घोटाले और इसके संभावित नतीजों का बारीकी से अध्धयन कर रहा था। हथियारों के घोटाले पर दस्तावेज़ को बहुत कम कर दिया गया है, लेकिन इसमें जांच की एक विस्तृत समयरेखा शामिल है, जिसमें यह तथ्य भी शामिल है कि स्टॉकहोम द्वारा आयोजित एक राष्ट्रीय ऑडिट ने संकेत दिया था कि बिचौलियों को कमीशन में 40 मिलियन डॉलर का भुगतान किया गया था। 

भारतीय प्रधान मंत्री गांधी द्वारा स्टॉकहोम की यात्रा के बाद जनवरी 1988 के अंत में इस जांच को समाप्त कर दिया गया था। तब सीआईए का आकलन था कि बोफोर्स ने लगभग निश्चित रूप से भुगतान किया है - या तो सीधे भारतीय अधिकारियों को या बिचौलियों को जिन्होंने अधिकारियों को भुगतान किया - कैसे होवित्जर की 1.2 बिलियन अमरीकी डालर की बिक्री (सिक) को सुरक्षित करने के लिए। 

बोफोर्स घोटाले के बाद राजीव गांधी 1989 में आम चुनाव हार गए, लेकिन जांच किसी निश्चित निष्कर्ष पर नहीं आई। स्विस व्यवसायी क्वात्रोच्चि और राजीव गांधी के नाम पर सीबीआई द्वारा 1999 में चार्जशीट दायर की गई थी और इस मामले की सुनवाई अभी सुप्रीम कोर्ट कर रही है। 

इस मुद्दे को लेकर काफी समय तक अभियुक्तों की सूची में राजीव गांधी का नाम भी आता रहा लेकिन उनकी मौत के बाद फाइल से नाम हटा दिया गया। बाद में इस मामले की जांच सीबीआई टीम को सौंपी गई। जोगिन्दर सिंह के सीबीआई चीफ रहते जांच काफी आगे भी बढ़ी लेकिन उनके हटते ही जांच ने दूसरी दिशा पकड़ ली।

इस बीच दावा किया गया था कि मामले में मुख्य आरोपी क्वात्रोक्की को प्रत्यर्पण कर भारत लाकर अदालत में पेश करते ही मामले का निबटारा हो जाएगा लेकिन बाद में सबूत के आभाव में उसे भी राहत मिल गई। यह सबूत का अभाव सिर्फ इस वजह से हुआ क्यूंकि स्वीडन सरकार ने राजीव गाँधी के कहने पर जांच बंद कर डी थी जो अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए के वृस्तृत जानकारी में प्राप्त होता है।

दिसंबर 2016 में आखिरी सुनवाई में, सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि 2015 में अधिकारियों द्वारा दिल्ली के खिलाफ अपील करने से इनकार कर दिया गया था।